"प्रथम भुगतान स्वयं को"










“प्रथम भुगतान स्वयं को” एक कठोर प्रक्रिया है जैसा कि एक साधु के लिए तपस्या करना, एक छात्र के लिए संघ लोक सेवा आयोग जैसी कठिन परीक्षा की तैयारी करना और जीवित रहने के लिए लगातार हमें संघर्ष करना

ऐसे ही एक मध्यमवर्गीय परिवार को धनवान बनने के लिए एक कदम उठाना पड़ता है जिसे “प्रथम भुगतान स्वयं को” की प्रक्रिया कहा जाता है

आज की तेजी से बदल रही दुनिया में आप कितना जानते है, यह महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि आप जितना जानते हैं वह लगातार पुराना होता जा रहा है और बाजार में नए तौर-तरीके तेजी से बढ़ रहे हैं

बाजार में पैसे बनाने के कुछ फॉर्मूले में से एक फार्मूला यह भी है कि “पैसे कमाने के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और जितनी ज्यादा मेहनत हम करेंगे उतने ज्यादा पैसे हमें मिलेंगे”

लेकिन यह तरीका अब पुराना हो चुका है जिसे हम गुफामानव के जमाने का तरीका भी कह सकते हैं

मेरे द्वारा पढ़ी गई अनेक किताबों का निष्कर्ष यह कहता है कि “खुद पर अनुशासन की ताकत” सबसे बड़ी ताकत होती है और खुद को सबसे पहले भुगतान करना, आपकी समृद्धि की ओर प्रथम कदम होता है

अगर हम खुद को प्रथम भुगतान नहीं कर सकते तो हमें धनवान या समृद्ध होने का सपना भी छोड़ देना चाहिए

यह कहना भी कठिन है कि “प्रथम भुगतान स्वयं को” की प्रक्रिया से ही हम धनवान बन सकते हैं लेकिन यह एक महत्वपूर्ण प्रकिया भी हो सकती है

एक मध्यम वर्ग के परिवार का जीवन आर्थिक रूप से एक तारीख को शुरू होता है और तीस तारीख आने से पहले-पहले ही खत्म हो जाता है उस परिवार के पास अनेक व्यक्ति आते हैं और कुछ ना कुछ कार्य करके वह उस परिवार से पैसा लेकर चले जाते हैं वह व्यक्ति एक शिक्षक हो सकता है, वह व्यक्ति एक डॉक्टर, एक दुकानदार,आपका दूधवाला, अखबार वाला और भी अनेक रूप में हो सकता है

इन सभी व्यक्तियों में से एक व्यक्ति हमें स्वयं को बनना पड़ता है और स्वयं की सेवा के लिए प्रथम भुगतान स्वयं को करना पड़ता है नीचे दिए चित्रण से हमे समझ में आता है कि मध्यमवर्गीय परिवार क्यों स्वयं को भुगतान नही कर पाता है




जब मध्यम वर्गीय परिवार आय प्राप्त करता है तो उसमें से उसे व्यय करना पड़ता है और बचत के कॉलम तक आने से पहले ही उसकी आय खत्म हो जाती है लेकिन अगर वह कॉलम बदल दे तो कुछ हद तक वह धनवान बनने की ओर अग्रसर हो सकता है

पैसों का मनोविज्ञान यह कहता है कि जितनी हमारी आमदनी होती है, उतनी ही हमारे खर्चे होते हैं अगर आमदनी ज्यादा है, तो खर्चे ज्यादा है और अगर आमदनी कम है, तो हमारे खर्चे भी कम होंगे

आय के बाद अगर प्रथम भुगतान स्वयं को कर दे तो बची हुई धनराशि में से हम हमारे खर्चे कर सकते हैं स्वयं को किया गया भुगतान, धीरे-धीरे एक बड़ी बचत राशि में बदल जाता है इससे आप और आपके द्वारा एकत्रित किया गया धन दोनों सक्रिय हो जाते हैं और वह धन, आपके लिए निवेश का एक नया मार्ग खोलते हैं वह निवेश का मार्ग चाहे, स्वयं का व्यापार हो, जमीन जायदाद में निवेश हो या किसी ओर के व्यापार में हिस्सेदारी हो, जब आपके द्वारा कमाया गया धन और उस धन के द्वारा कमाया गया नया धन, तीनों के द्वारा लगातार धन के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं तो हम एक दिन स्वयं  “धन-समृद्धि” को प्राप्त कर लेते हैं

 

Arth Prabandhan

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