हमारी भावनाओं का वित्तीय योजनाओं पर प्रभाव









हमारी दीर्घकालिक योजनाएं जैसे रिटायरमेंट प्लानिंग जितनी आसान प्रतीत होती है उससे अधिक कठिन होती है क्योंकि समय के साथ में लोगों के लक्ष्य और कामनाएं बदल जाती है हर पांच साल का बच्चा बड़ा होकर ट्रैक्टर चलाना चाहता है और शायद ही ऐसा कोई और काम हो जो एक छोटे से बच्चे को उस समय इस काम से बेहतर लगे

उस बच्चे के सपने में वह ट्रैक्टर और उसकी आवाज गूंजती रहती है फिर बड़े होने पर उसे समझ में आता है शायद ट्रैक्टर का ड्राइवर बनना एक अच्छा करियर नहीं है किशोरावस्था में हमारा सपना बड़ा होकर एक डॉक्टर,वकील या कोई एक बड़ा प्रशासनिक अधिकारी बनने का होता है

जैसे-जैसे समझ आगे बढ़ती है तो हमें पता चलता है कि एक अच्छा डॉक्टर,वकील या प्रशासनिक अधिकारी बनने में जो मेहनत व तपस्या हमे करनी पड़ेगी वह शायद हमसे नहीं हो पाएगी इसलिए हम एक बीच का रास्ता चुन लेते हैं और जीवन का यह क्रम यूं ही हमारी भावनाओं के साथ में चलता रहता है

जब हम दीर्घकालिक वित्तीय योजनाएं बनाते हैं तो समय के साथ हमारी भावनाओं के द्वारा वह वित्तीय लक्ष्य हमें कभी प्राप्त होते हुए नजर आते हैं और कभी-कभी वह वित्तीय लक्ष्य हमे ओझल होते हुए नजर आते है यह सारा खेल हमारी “भावनाओ” का है





किशोरावस्था में जिस टैटू को बनवाने में हम जितना पैसा खर्च करते हैं, युवावस्था आने पर दुगना पैसा देकर हम उस टैटू को हटवाते हैं

चार्ली मुंगेर महान निवेशक कहते हैं कि कंपाउंडिंग का पहला नियम यह है कि बिना किसी कारण इसे बाधित ना किया जाए

वारेन बफेट जैसे लोगों का सफल होने का मुख्य कारण यह है कि सालों तक वह एक ही कार्य को करते रहे जिससे वह अपने निवेश में पराकाष्ठा को कंपाउंडिंग की मदद से प्राप्त कर गए

मानव सभ्यता के प्रारंभ से आज तक केवल निवेश के विकल्प ही बदलते रहे हैं, लेकिन निवेश नामक शब्द हमारे जीवन से कभी नहीं गया

जब बात रिटायरमेंट प्लानिंग की आती है तो हम जीवन के एक अलग अवस्था में होते हैं और जब उसका प्रतिफल हमें प्राप्त करना होता है तो हम जीवन की दूसरी अवस्था में होते हैं

निर्णय लेना और प्रतिफल प्राप्त करने के बीच एक लंबा समय होता है और इस समय के बीच हमें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना होता है और अपने लक्ष्य की और लगातार आगे बढ़ना होता है ताकि हम अपने रिटायरमेंट प्लानिंग का आनंद प्राप्त कर सके 

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